Patanjali Yoga Sutra Notes in hindi

Complete patanjali Yoga Sutra Notes in hindi free view & download

 UNIT-1

  • Introduction to maharshi Patanjali and Patanjali Yoga Sutra
  • Brief introduction to traditional commentator
  • Concept of Chitta Bhoomis
  • Concept Of Chitta Vritti
  • Chitta-vritti Nirodhopaya
  • Concept of Ishwar and Ishwar pranidhan
  • Qualities of Ishwar
  • Concepts Of samadhi and Types (Samprajnata & Asamprajnata)
  • Citta Vikshepas (Antarayas)
  • Concepts Of Chitta Prasadanam and its Relevevance in Yoga sadhana.

UNIT-2 Samadhi pada

UNIT-3 Sadhan Pada

UNIT-4 Vibhuti Pada & Kaivalya Pada

 

Patanjali Yoga Sutra Syllabus Of – B.A/B.Sc & M.A/M.Sc. (Yogic Science)

इकाई -1 परिचय

  • महर्षि पतंजलि का परिचय-
  • योग सूत्र एवं उसके भाष्यकारों का परिचय
  • चित्त की भूमियाँ –
  • चित्त की वृत्तियाँ –
  • चित्त वृत्ति निरोधोपय-
  • ईश्वर का स्वरुप एवं ईश्वर प्रणिधान-
  • समाधि एवं उसके प्रकार
  • संप्रज्ञात समाधि
  • चित्त विक्षेपास्ते अन्तराय-
  • चित्त प्रसादन के उपाय –

इकाई -२समाधि पाद

  • योगानुशासनम की अवधारणा –
  • योग लक्षण एवं इसके परिणाम-
  • समाधि के प्रकार

इकाई -३साधन पाद

  • क्रियायोग की अवधारणा-
  • क्लेश का सिद्धांत –
  • दुखवाद की अवधारणा-
  • द्रष्टा- दृश्य निरुपणम-
  • प्रकृति पुरुष संयोग –
  • अष्टांग योग संक्षिप्त परिचय-
  • आसन प्राणायाम की अवधारणा एवं सिद्धि –
  • प्रत्याहार की अवधारणा एवं इसकी सिद्धि-

इकाई -४विभूति पाद एवं कैवल्य पाद 

  • धारणा, ध्यान एवं समाधि परिचय –
  • संयम एवं इसकी सिद्धि-
  • तीन प्रकार के चित्त परिणाम-
  • भूत जय, इन्द्रिय जय एवं उनकी सिद्धि –
  • विवेक ज्ञान निरुपणम
  • कैवल्य
  • पांच प्रकार के सिद्धि एवं जत्यांतर परिणाम –
  • निर्माण चित्त की अवधारणा –
  • कर्म के चार प्रकार-
  • वासना की अवधारणा एवं
  • बाह्य पदार्थ की अवधारणा

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पतंजली योग सूत्र [responsivevoice_button voice=” Hindi Female” buttontext=”Listen to Notes”]

इकाई -1 परिचय

विविध भारतीय दर्शनों के बीच योग दर्शन का स्थान अत्यन्त महत्वपूर्ण है। योग का स्वरूप अत्यन्त व्यापक है परन्तु इसकी मौलिक अवधारणा दार्शनिक एवं आध्यात्मिक है। ऐतिहासिक दृष्टि से योग विज्ञान का विकास कई खण्डों में हुआ है, जो प्राचीन उपनिषदों, श्रीमद्भगवद्गीता तथा पातंजलि योगसूत्रों में निहित योग के आधारभूत ज्ञान से लेकर तदनन्तर कालीन हिन्दू, जैन, बौद्ध, सूफी तथा सिक्ख आदि धर्मों के दार्षनिक विचारों के माध्यम से विविध रूप में विकसित होता हुआ योग का ज्ञान आधुनिक काल में स्वामी विवेकानंद, श्री अरविंद, महात्मा गांधी आदि विचारकों के प्रयास के स्वरूप में दिखाई देता है। वस्तुतः योग भारतीय दर्शन का सार है।

यह एक सुविदित तथ्य है कि भारतीय दर्शन का चरम लक्ष्य प्राणियों को त्रिविध दुःखों से सदा के लिये छुटकारा दिलाना ही है। दुःखों की यह आत्यंतिक निवृत्ति, मुक्ति, मोक्ष, कैवल्य, अपवर्ग, निःश्रेयस्, निर्वाण और परमपद इत्यादि पदों से अभिहित की गई है। इसकी सिद्धि के लिये प्रायः हम सभी भारतीय दर्शन (चार्वाक और मीमांसा के अतिरिक्त) पदार्थों के शुद्ध ज्ञान को किसी न किसी प्रकार से अपरिहार्य उपाय मानते हैं श्रुतियों ने भी ‘ऋते ज्ञानान्न मुक्तिः’ का तथ्य स्वीकृत किया। पदार्थ के इस शुद्ध ज्ञान को विभिन्न दर्शनों में तत्वज्ञान, सम्यक् ज्ञान, तत्व साक्षात्कार, परम ज्ञान, आत्मज्ञान और विवेक ख्याति इत्यादि नाम से दिये गये हैं। इस शुद्ध ज्ञान का एक रूप तो वह है जो बुद्धि की षुद्ध सात्विक वृत्ति के द्वारा प्राप्त किया जाता है तथा दूसरा तथा उत्तम रूप वह है, जो वृत्तिहीन स्थिति में आत्मा का अपरोक्ष अनुभव होता है। इनमें से प्रथम प्रकार का तत्वज्ञान सांख्य योग में ‘विवेक ख्याति’ के नाम से प्रसिद्ध है और द्वितीय प्रकार का तत्व दर्शन योग शास्त्र में ‘असम्प्रज्ञात योग’ के नाम से विख्यात है। दोनों प्रकार के शुद्धज्ञान को प्राप्त करने की प्रक्रिया बड़ी जटिल है। इस उभयस्तरीय प्रक्रिया का रचनात्मक स्वरूप ही पतंजली योग दर्शन में वर्णित है।

योग दर्शन, साधकों के लिये परम उपयोगी शास्त्र है , इनमें अन्य दर्शनों में खण्डन- मण्डन के बिना बहुत सरलतापूर्वक कम शब्दों में योग के सिद्धान्त का निरूपण किया गया है। इस ग्रंथ पर अब तक संस्कृत एवं हिन्दी और अलग- अलग भाषाओं में भाष्य और टिकाएँ लिखी जा चुकी है। भोज वृत्ति और व्यास के अनुवाद भी हिन्दी भाषा में कई स्थानों से प्रकाशित हो चुके है। इसके अतिरिक्त ‘पातंजल योग प्रदीप’ नामक ग्रंथ के स्वामी ओमानन्द का लिखा हुआ भी प्रकाशित हो चुका है, इसमें व्यास भाष्य एवं भोज वृत्ति के अतिरिक्त अन्य योग विषयक शास्त्रों के भी बहुत से प्रमाण संग्रह करके एवं उपनिषद् एवं श्रीमद्भगवद्गीता आदि सद्ग्रंथों तथा दूसरे दर्शनों के साथ भी समन्वय करके गं्रथों को बहुत उपयोगी बनाया गया है।

योग भाष्यकार व्यास –  योगशास्त्र के इतिहास में पतंजलि के पश्चात् जिस कृति का नाम सर्वाधिक प्रसिद्ध है, वह है व्यास द्वारा रचित व्यास भाष्य। अध्येताओं की दृष्टि में योगसूत्र की भांति योगभाष्य भी अतीव महत्वपूर्ण एवं प्रामाणिक कृति है। योग दर्शन का शास्त्रीय तथा व्यावहारिक उभयविध स्वरूप- निरूपण योगभाष्य के आधार पर किया जाता है। इस भाष्य की प्रसिद्धि ‘योग भाष्य’ , ‘पातंजल भाष्य’ और ‘सांख्य प्रवचन भाष्य’ आदि नामों से है।

योग सूत्र का परिचय -इसमें चार पाद हैं –

1. समाधिपाद,  2. साधनपाद,  3. विभूतिपाद,  4. कैवल्यपाद । इन सभी का संक्षिप्त वर्णन इस प्रकार है –

1.समाधिपाद – 

 

पहले पाद में योग के लक्षण, स्वरूप और उसकी प्राप्ति के उपायों का वर्णन करते हुए चित्त की वृत्तियों के पांच भेद और उनके लक्षण बताये हैं। वहां सूत्रकार ने निद्रा को भी वृत्ति विषेष के अंतर्गत माना है। (योगसूत्र 1/10) तथा विपर्यय वृत्ति का लक्षण करते समय उसे मिथ्या ज्ञान बताया गया है। अतः साधारण तौर पर यही समझ में आता है कि दूसरे पाद में ‘अवि़द्या’ के नाम से जिस प्रधान क्लेश का वर्णन किया गया है। (योगसूत्र 2/4), वह, और चित्त की विपर्यय वृत्ति दोनों एक ही है। परन्तु गंभीरता पूर्वक विचार करने पर यह बात ठीक नहीं मालूम होती है। द्रष्टा व दर्शन की एकतारूप अस्मिता क्लेश के कारण का नाम ‘अविद्या’ है।

प्रधानतया योग के तीन भेद माने गये हैं- एक सविकल्प दूसरा निर्विकल्प , तीसरा निर्बीज। इस पाद में निर्बीज समाधि का उपाय प्रधानतया पर वैराग्य को बताकर (योगसूत्र 1/18) उसके बाद दूसरा सरल उपाय ईश्वर की शरणागति को बतलाया है। (योगसूत्र 2/23), श्रद्धालु आस्तिक साधकों के लिये यह बड़ा ही उपयोगी है।

उपर्युक्त तीन भेदों में से सम्प्रज्ञात योग के दो भेद हैं उनमें से जो सविकल्प योग है वह तो पूर्वावस्था है, उसमें विवेक ज्ञान नहीं होता। दूसरा जो निर्विकल्प योग है, जिसे निर्विचार समाधि भी कहते हैं वह जब निर्मल हो जाता है। (1/47) उस समय उसमें विवेक ज्ञान प्रकट होता है। वह विवेक ज्ञान पुरुष ख्याति तक हो जाता है। (योगसूत्र 2/28, 3/35) जो कि परवैराग्य का हेतु है। (योगसूत्र 1/16) क्येांकि प्रकृति और पुरुष के वास्तविक स्वरूप का ज्ञान होने के साथ ही साधक की समस्त गुणों में और उनके कार्यों में आसक्ति का सर्वथा अभाव हो जाता है। तब चित्त में कोई वृत्ति नहीं रहती, यह सब सर्ववृत्ति निरोध रूप निर्बीज समाधि है। (1/51) इसी को असम्प्रज्ञात तथा धर्ममेघ समाधि (योगसूत्र 4/29) भी कहते हैं। इसकी विस्तृत व्याख्या की गई है। निर्बीज समाधि ही योग का अंतिम लक्ष्य है। इसी से आत्मा की स्वरूप प्रतिष्ठा या यों कहें कि कैवल्य स्थिति होती है। (योग सूत्र 4/34)।

 

        समाधिपाद में वर्णित विषय एवं सूत्र संख्या निम्न प्रकार से है –

  • ग्रंथ के आरंभ की प्रतिज्ञा, योग के लक्षण और उसकी आवष्यकता का प्रतिपादन 1- 4
  • चित्त की वृत्तियों के पांच भेद एवं उसके लक्षण 5- 11
  • अभ्यास और वैराग्य का प्रकरण        12-16
  • समाधि का विषय                                    17-22
  • ईश्वर प्रणिधान एवं उसके फल का कथन          23-29
  • चित्त के विक्षपों, उनके नाश का और मन की स्थिति के लिये भिन्न- भिन्न उपायों का वर्णन  /    30-40
  • समाधि के फल सहित अवान्तर भेदों का वर्णन 41-51

2.साधनपाद –

इस दूसरे पाद में अविद्यादि पांच क्लेषों को समस्त दुःखों का कारण बताया गया है क्योंकि इनके रहते हुए मनुष्य जो कुछ कर्म करता है वे संस्कार रूप में अंतःकरण में इकट्ठे होते रहते हैं। उन संस्कारों के समुदाय नाम ही कर्माषय है। इस कर्माषय के कारण भूत- क्लेश जब तक रहते हैं तब तक जीव को उनका फल भोगने के लिये कई प्रकार की योनियों में बार- बार जन्मना और मरना पड़ता है एवं पाप कर्म भोगने के लिये घोर नरकों की यातना भी सहन करनी पड़ती है। पुण्य कर्मों फल जो अच्छी योनियों की ओर सुख भोग संबंधी सामग्री की प्राप्ति है, वह भी विवेक की दृष्टि से दुःख ही है। (योगसूत्र 2/15) अतः समस्त दुःखों का सर्वथा अत्यन्त अभाव करने के लिये क्लेषों को मूल से नष्ट करना परमावश्यक है। इस पाद में उनके नाश का उपाय निष्चल और निर्मल विवेक ज्ञान को योगसूत्र 2/26 तथा उस विवेक ज्ञान की प्राप्ति का उपाय योग संबंधी आठ अंगों के अनुष्ठान को योग सूत्र 2/28 में बताया गया है।

साधन पाद में वर्णित विषय एवं सूत्र संख्या निम्न प्रकार है –

  •       क्रियायोग के स्वरूप और फल का निरूपण    / 1- 2
  •       अविद्यादि पांच क्लेषों का वर्णन                       /  3-9
  •       क्लेषों के नाश का उपाय एवं उसकी आवश्यकता का प्रतिपादन  /10-17
  •       दृष्य और दृष्टा के स्वरूप का तथा दृष्य की सार्थकता का कथन     / 18-22
  •       प्रकृति-पुरुष के अविद्याकृत संयोग का स्वरूप एवं उसके नाश के उपायभूत अविचल विवेकज्ञान का निरूपण  / 23-27
  •       विवेक ज्ञान की प्राप्ति के लिये अष्टांग योग के अनुष्ठान की आवष्यकता, आठों अंगों के नाम तथा उनमें से पांच बाह्य अंगों के लक्षण और उनके विभिन्न अवान्तर फलों का वर्णन   /  28-55

3.विभूतिपाद –

इस तीसरे विभूतिपाद में धारणा, ध्यान और समाधि – इन तीनों का एकत्रित नाम ‘संयम’ बतलाकर भिन्न- भिन्न ध्येय पदार्थों में संयम का भिन्न- भिन्न फल बतलाया है। उनको योग का महत्व सिद्धि और विभूति भी कहते है । इस पाद के  3/37, 3/50, 3/51 एवं 4/29 में उनको समाधि में विघ्नरूप बताया है। अतः साधक को भूलकर भी सिद्धियों के प्रलोभन में नहीं पड़ना चाहिए।

विभूतिपाद में वर्णित विषय एवं सूत्र संख्या निम्न प्रकार से है –

  •       धारणा, ध्यान और समाधि इन तीनों अंगों के स्वरूप प्रतिपादन  / 1-3
  •       निर्बीज समाधि के बहिरंग साधनरूप संयम का निरूपण /  4-8
  •       चित्त के परिणामों का विषय    /9-12
  •       प्रकृति जनित समस्त पदार्थो के परिणाम का निरूपण  /  13-15
  •       फल सहित भिन्न- भिन्न संयमों का वर्णन   / 16-48
  •       विवेक ज्ञान और उसके परम फलस्वरूप कैवल्य का निरूपण /49-55

4.कैवल्यपाद – 

इस चौथे पाद में कैवल्यावस्था प्राप्त करने योग्य चित्त के स्वरूप का प्रतिपादन किया गया है। (यो0सू0 4/26) अंत में धर्ममेघ समाधि का वर्णन करके (योगसूत्र 4/29) उसका फल क्लेश और कर्मों का सर्वथा अभाव (यो0सू0 4/30) तथा गुणों के परिणाम-क्रम  की समाप्ति । अर्थात् पुनर्जन्म का अभाव बताया गया है। (यो0सू0 4/32) एवं पुरुष को मुक्ति प्रदान करके अपना कर्तव्य पूरा कर चुकने के कारण गुणों के कार्य का अपने कारण में विलीन हो जाना अर्थात् पुरुष से सर्वथा अलग हो जाना गुणों की कैवल्य स्थिति और उन गुणों से सर्वथा अलग होकर अपने रूप में प्रतिष्ठित हो जाना ही कैवल्य स्थिति बतलाकर (यो0सू0 4/34) ग्रन्थ की समाप्ति की गई है।

कैवल्यपाद में वर्णित विषय एवं सूत्र संख्या निम्न प्रकार से है –

  •       सिद्धियों की प्राप्ति के पांच हेतुओं का तथा जात्यन्तर परिणाम का विषय    / 1-5
  •       ध्यानजनित परिणाम की संस्कार शून्यता (निराषयता) का प्रतिपादन एवं योगी के कर्मों की महिमा / 6-7
  •       साधारण मनुष्यों की कर्म फल प्राप्ति के प्रकार का वर्णन /8-11
  •       अपने सिद्धान्त का युक्तिपूर्ण प्रतिपादन /12-24
  •       विवेक ज्ञान का विषय व धर्ममेघ समाधि तथा कैवल्य अवस्था का निरूपण   /25-34

महर्षि पतंजलि के अनुसार मानवीय प्रकृति (भौतिक तथा आत्मिक) के भिन्न तत्वों के नियंत्रण द्वारा पूर्णता प्राप्ति के लिये किया गया विधिपूर्वक प्रयत्न ही योग है। भौतिक शरीर, सक्रिय इच्छा .शक्तिऔर समझने की .शक्तिरखने वाले मन को नियंत्रण के अंदर लाना आवश्यक है। पतंजलि ने कुछ ऐसे अभ्यासों पर बल दिया है जिनसे .शारीरिक  विकृति की चिकित्सा हो सकती है और शरीर की मलीनता दूर की जा सकती है। जब इन अभ्यासों से हमें अधिक शक्ति, दीर्घकालीन युवावस्था, .शारीरिक स्वस्थता और दीर्घजीवन प्राप्त हो जाय, तो इनका प्रयोग आध्यात्मिक विकास के लिये करना उचित है। इससे मानव जीवन के चरम लक्ष्य कैवल्य या मोक्ष को प्राप्त किया जा सकेगा। चित्त की शुद्ध, शांति एवं एकाग्रता के लिये अन्य विधियों को भी उपयोग में लाया जाता है। पतंजलि का मुख्य लक्ष्य आध्यात्मिक सिद्धान्त का प्रतिपादन नहीं, अपितु क्रियात्मक रूप से यह संकेत करना है कि संयमी जीवन के द्वारा किस प्रकार मोक्ष प्राप्त किया जा सकता है ।

 

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सम्पूर्ण पतंजलि योग सूत्र – 195 सूत्र 

(महत्वपूर्ण सूत्रों को अवश्य स्मरण करने का प्रयास करे ..)

1.समाधिपाद  – 51 सूत्र   

  1. अथ योगानुशासनम्॥१॥
  2. योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः॥२॥
  3. तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम्॥३॥
  4. वृत्तिसारूप्यमितरत्र॥४॥
  5. वृत्तयः पञ्चतय्यः क्लिष्टाक्लिष्टाः॥५॥
  6. प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः॥६॥
  7. प्रत्यक्षानुमानागमाः प्रमाणानि॥७॥
  8. विपर्ययो मिथ्याज्ञानमतद्रूपप्रतिष्ठम्॥८॥
  9. शब्दज्ञानानुपाती वस्तुशून्यो विकल्पः॥९॥
  10. अभावप्रत्ययालम्बना वृत्तिर्निद्रा॥१०॥
  11. अनुभूतविषयासंप्रमोषः स्मृतिः॥११॥
  12. अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः॥१२॥
  13. तत्र स्थितौ यत्नोऽभ्यासः॥१३॥
  14. स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्कारासेवितो दृढभूमिः॥१४॥
  15. दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम्॥१५॥
  16. तत्परं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम्॥१६॥
  17. वितर्कविचारानन्दास्मितारूपानुगमात् संप्रज्ञातः॥१७॥
  18. विरामप्रत्ययाभ्यासपूर्वः संस्कारशेषोऽन्यः॥१८॥
  19. भवप्रत्ययो विदेहप्रकृतिलयानाम्॥१९॥
  20. श्रद्धावीर्यस्मृतिसमाधिप्रज्ञापूर्वक इतरेषाम्॥२०॥
  21. तीव्रसंवेगानामासन्नः॥२१॥
  22. मृदुमध्याधिमात्रत्वात् ततोऽपि विशेषः॥२२॥
  23. ईश्वरप्रणिधानाद्वा॥२३॥
  24. क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्टः पुरुषविशेष ईश्वरः॥२४॥
  25. तत्र निरतिशयं सर्वज्ञबीजम्॥२५॥
  26. पूर्वेषाम् अपि गुरुः कालेनानवच्छेदात्॥२६॥
  27. तस्य वाचकः प्रणवः॥२७॥
  28. तज्जपस्तदर्थभावनम्॥२८॥
  29. ततः प्रत्यक्चेतनाधिगमोऽप्यन्तरायाभावश्च॥२९॥
  30. व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस्याविरतिभ्रान्तिदर्शनालब्धभूमिकत्वानवस्थितत्वानि चित्तविक्षेपास्तेऽन्तरायाः॥३०॥
  31. दुःखदौर्मनस्याङ्गमेजयत्वश्वासप्रश्वासा विक्षेपसहभुवः॥३१॥
  32. तत्प्रतिषेधार्थमेकतत्त्वाभ्यासः॥३२॥
  33. मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षणां सुखदुःखपुण्यापुण्यविषयाणां भावनातश्चित्तप्रसादनम्॥३३॥
  34. प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य॥३४॥
  35. विषयवती वा प्रवृत्तिरुत्पन्ना मनसः स्थितिनिबन्धिनी॥३५॥
  36. विशोका वा ज्योतिष्मती॥३६॥
  37. वीतरागविषयं वा चित्तम्॥३७॥
  38. स्वप्ननिद्राज्ञानालम्बनं वा॥३८॥
  39. यथाभिमतध्यानाद्व॥३९॥
  40. परमाणु परममहत्त्वान्तोऽस्य वशीकारः॥४०॥
  41. क्षीणवृत्तेरभिजातस्येव मणेर्ग्रहीतृग्रहणग्राह्येषु तत्स्थतदञ्जनतासमापत्तिः॥४१॥
  42. तत्र शब्दार्थज्ञानविकल्पैः संकीर्णा सवितर्का समापत्तिः॥४२॥
  43. स्मृतिपरिशुद्धौ स्वरूपशून्येवार्थमात्रनिर्भासा निर्वितर्का॥४३॥
  44. एतयैव सविचारा निर्विचारा च सूक्ष्मविषया व्याख्याता॥४४॥
  45. सूक्ष्मविषयत्वं चालिङ्गपर्यवसानम्॥४५॥
  46. ता एव सबीजः समाधिः॥४६॥
  47. निर्विचारवैशारद्येऽध्यात्मप्रसादः॥४७॥
  48. ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा॥४८॥
  49. श्रुतानुमानप्रज्ञाभ्यामन्यविषया विशेषार्थत्वात्॥४९॥
  50. तज्जः संस्कारोऽन्यसंस्कारप्रतिबन्धी॥५०॥
  51. तस्यापि निरोधे सर्वनिरोधान्निर्बीजः समाधिः॥५१॥

2.साधनपाद -55  सूत्र  

  1. तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि क्रियायोगः॥१॥
  2. समाधिभावनार्थः क्लेशतनूकरणार्थश्च॥२॥
  3. अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशाः क्लेशाः॥३॥
  4. अविद्याक्षेत्रमुत्तरेषां प्रसुप्ततनुविच्छिन्नोदाराणाम्॥४॥
  5. अनित्याशुचिदुःखानात्मसु नित्यशुचिसुखात्मख्यातिरविद्या॥५॥
  6. दृग्दर्शनशक्त्योरेकात्मतेवास्मिता॥६॥
  7. सुखानुशयी रागः॥७॥
  8. दुःखानुशयी द्वेषः॥८॥
  9. स्वरसवाही विदुषोऽपि तथारूढो भिनिवेशः॥९॥
  10. ते प्रतिप्रसवहेयाः सूक्ष्माः॥१०॥
  11. ध्यानहेयास्तद्वृत्तयः॥११॥
  12. क्लेशमूलः कर्माशयो दृष्टादृष्टजन्मवेदनीयः॥१२॥
  13. सति मूले तद्विपाको जात्यायुर्भोगाः॥१३॥
  14. ते ह्लादपरितापफलाः पुण्यापुण्यहेतुत्वात्॥१४॥
  15. परिणामतापसंस्कारदुःखैर्गुणवृत्तिविरोधाच्च दुःखमेव सर्वं विवेकिनः॥१५॥
  16. हेयं दुःखमनागतम्॥१६॥
  17. द्रष्टृदृश्ययोः संयोगो हेयहेतुः॥१७॥
  18. प्रकाशक्रियास्थितिशीलं भूतेन्द्रियात्मकं भोगापवर्गार्थं दृश्यम्॥१८॥
  19. विशेषाविशेषलिङ्गमात्रालिङ्गानि गुणपर्वाणि॥१९॥
  20. द्रष्टा दृशिमात्रः शुद्धोऽपि प्रत्ययानुपश्यः॥२०॥
  21. तदर्थ एव दृश्यस्यात्मा॥२१॥
  22. कृतार्थं प्रति नष्टमप्यनष्टं तदन्यसाधारणत्वात्॥२२॥
  23. स्वस्वामिशक्त्योः स्वरूपोपलब्धिहेतुः संयोगः॥२३॥
  24. तस्य हेतुरविद्या॥२४॥
  25. तदभावात् संयोगाभावो हानं तद् दृशेः कैवल्यम्॥२५॥
  26. विवेकख्यातिरविप्लवा हानोपायः॥२६॥
  27. तस्य सप्तधा प्रान्तभूमिः प्रज्ञा॥२७॥
  28. योगाङ्गाऽनुष्ठानादशुद्धिक्षये ज्ञानदीप्तिराविवेकख्यातेः॥२८॥
  29. यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधयोऽष्टावङ्गानि॥२९॥
  30. अहिंसासत्यास्तेयब्रह्मचर्यापरिग्रहा यमाः॥३०॥
  31. जातिदेशकालसमयानवच्छिन्नाः सार्वभौमा महाव्रतम्॥३१॥
  32. शौचसंतोषतपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानि नियमाः॥३२॥
  33. वितर्कबाधने प्रतिपक्षभावनम्॥३३॥
  34. वितर्का हिंसादयः कृतकारितानुमोदिता लोभक्रोधमोहपूर्वका मृदुमध्याधिमात्रा दुःखाज्ञानानन्तफला इति प्रतिपक्षभावनम्॥३४॥
  35. अहिंसाप्रतिष्ठायां तत्सन्निधौ वैरत्यागः॥३५॥
  36. सत्यप्रतिष्ठायां क्रियाफलाश्रयत्वम्॥३६॥
  37. अस्तेयप्रतिष्ठायां सर्वरत्नोपस्थानम्॥३७॥
  38. ब्रह्मचर्यप्रतिष्ठायां वीर्यलाभः॥३८॥
  39. अपरिग्रहस्थैर्ये जन्मकथंतासंबोधः॥३९॥
  40. शौचात् स्वाङ्गजुगुप्सा परैरसंसर्गः॥४०॥
  41. सत्त्वशुद्धिसौमनस्यैकाग्र्येन्द्रियजयात्मदर्शनयोग्यत्वानि च॥४१॥
  42. संतोषादनुत्तमसुखलाभः॥४२॥
  43. कायेन्द्रियसिद्धिरशुद्धिक्षयात्तपसः॥४३॥
  44. स्वाध्यायादिष्टदेवतासंप्रयोगः॥४४॥
  45. समाधिसिद्धिरीश्वरप्रणिधानात्॥४५॥
  46. स्थिरसुखमासनम्॥४६॥
  47. प्रयत्नशैथिल्यानन्त्यसमापत्तिभ्याम्॥४७॥
  48. ततो द्वन्द्वानभिघातः॥४८॥
  49. तस्मिन् सति श्वासप्रश्वासयोर्गतिविच्छेदः प्राणायामः॥४९॥
  50. बाह्याभ्यन्तरस्तम्भवृत्तिर्देशकालसंख्याभिः परिदृष्टो दीर्घसूक्ष्मः॥५०॥
  51. बाह्याभ्यन्तरविषयाक्षेपी चतुर्थः॥५१॥
  52. ततः क्षीयते प्रकाशावरणम्॥५२॥
  53. धारणासु च योग्यता मनसः॥५३॥
  54. स्वविषयासंप्रयोगे चित्तस्य स्वरूपानुकार इवेन्द्रियाणां प्रत्याहारः॥५४॥
  55. ततः परमा वश्यतेन्द्रियाणाम्॥५५॥

3. विभूतिपाद -55 सूत्र 

  1. देशबन्धश्चित्तस्य धारणा॥१॥
  2. तत्र प्रत्ययैकतानता ध्यानम्॥२॥
  3. तदेवार्थमात्रनिर्भासं स्वरूपशून्यमिव समाधिः॥३॥
  4. त्रयमेकत्र संयमः॥४॥
  5. तज्जयात्प्रज्ञालोकः॥५॥
  6. तस्य भूमिषु विनियोगः॥६॥
  7. त्रयमन्तरङ्गं पूर्वेभ्यः॥७॥
  8. तदपि बहिरङ्गं निर्बीजस्य॥८॥
  9. व्युत्थाननिरोधसंस्कारयोरभिभवप्रादुर्भावौ निरोधक्षणचित्तान्वयो निरोधपरिणामः॥९॥
  10. तस्य प्रशान्तवाहिता संस्कारात्॥१०॥
  11. सर्वार्थतैकाग्रतयोः क्षयोदयौ चित्तस्य समाधिपरिणामः॥११॥
  12. ततः पुनः शान्तोदितौ तुल्यप्रत्ययौ चित्तस्यैकाग्रतापरिणामः॥१२॥
  13. एतेन भूतेन्द्रियेषु धर्मलक्षणावस्थापरिणामा व्याख्याताः॥१३॥
  14. शान्तोदिताव्यपदेश्यधर्मानुपाती धर्मी॥१४॥
  15. क्रमान्यत्वं परिणामान्यत्वे हेतुः॥१५॥
  16. परिणामत्रयसंयमासदतीतानागतज्ञानम्॥१६॥
  17. शब्दार्थप्रत्ययानामितरेतराध्यासात् संकरस्तत्प्रविभागसंयमात् सर्वभूतरुतज्ञानम्॥१७॥
  18. संस्कारसाक्षत्करणात् पूर्वजातिज्ञानम्॥१८॥
  19. प्रत्ययस्य परचित्तज्ञानम्॥१९॥
  20. न च तत् सालम्बनं तस्याविषयीभूतत्वात्॥२०॥
  21. कायरूपसंयमात् तद्ग्राह्यशक्तिस्तम्भे चक्षुःप्रकाशासंप्रयोगेऽन्तर्धानम्॥२१॥
  22. सोपक्रमं निरुपक्रमं च कर्म तत्संयमादपरान्तज्ञानमरिष्टेभ्यो वा॥२२॥
  23. मैत्र्यादिषु बलानि॥२३॥
  24. बलेषु हस्तिबलादीनि॥२४॥
  25. प्रवृत्त्यालोकन्यासात् सूक्ष्मव्यवहितविप्रकृष्टज्ञानम्॥२५॥
  26. भुवनज्ञानं सूर्ये संयमात्॥२६॥
  27. चन्द्रे ताराव्यूहज्ञानम्॥२७॥
  28. ध्रुवे तद्गतिज्ञानम्॥२८॥
  29. नाभिचक्रे कायव्यूहज्ञानम्॥२९॥
  30. कण्ठकूपे क्षुत्पिपासानिवृत्तिः॥३०॥
  31. कूर्मनाड्यां स्थैर्यम्॥३१॥
  32. मूर्धज्योतिषि सिद्धदर्शनम्॥३२॥
  33. प्रातिभाद्वा सर्वम्॥३३॥
  34. हृदये चित्तसंवित्॥३४॥
  35. सत्त्वपुरुषयोरत्यन्तासंकीर्णयोः प्रत्ययाविशेषो भोगः परार्थान्यस्वार्थसंयमात् पुरुषज्ञानम्॥३५॥
  36. ततः प्रातिभश्रावणवेदनादर्शास्वादवार्ता जायन्ते॥३६॥
  37. ते समाधावुपसर्गा व्युत्थाने सिद्धयः॥३७॥
  38. बन्धकारणशैथिल्यात्प्रचारसंवेदनाच्च चित्तस्य परशरीरावेशः॥३८॥
  39. उदानजयाज्जलपङ्ककण्टकादिष्वसङ्ग उत्क्रान्तिश्च॥३९॥
  40. समानजयाज्ज्वलनम्॥४०॥
  41. श्रोत्राकाशयोः संबन्धसंयमाद्दिव्यं श्रोत्रम्॥४१॥
  42. कायाकाशयोः संबन्धसंयमाल्लघुतूलसमापत्तेश्चाकाशगमनम्॥४२॥
  43. बहिरकल्पिता वृत्तिर्महाविदेहा ततः प्रकाशावरणक्षयः॥४३॥
  44. स्थूलस्वरूपसूक्ष्मान्वयार्थवत्त्वसंयमाद भूतजयः॥४४॥
  45. ततोऽणिमादिप्रादुर्भावः कायसंपत्तद्धर्मानभिघातश्च॥४५॥
  46. रूपलावण्यबलवज्रसंहननत्वानि कायसंपत्॥४६॥
  47. ग्रहणस्वरूपास्मितान्वयार्थवत्त्वसंयमादिन्द्रियजयः॥४७॥
  48. ततो मनोजवित्वं विकरणभावः प्रधानजयश्च॥४८॥
  49. सत्त्वपुरुषान्यताख्यातिमात्रस्य सर्वभावाधिष्ठातृत्वं सर्वज्ञातृत्वं च॥४९॥
  50. तद्वैराग्यादपि दोषबीजक्षये कैवल्यम्॥५०॥
  51. स्थान्युपनिमन्त्रणे सङ्गस्मयाकरणं पुनरनिष्टप्रसङ्गात्॥५१॥
  52. क्षणतत्क्रमयोः संयमाद्विवेकजं ज्ञानम्॥५२॥
  53. जातिलक्षणदेशैरन्यतानवच्छेदात् तुल्ययोस्ततः प्रतिपत्तिः॥५३॥
  54. तारकं सर्वविषयं सर्वथाविषयमक्रमं चेति विवेकजं ज्ञानम्॥५४॥
  55. सत्त्वपुरुषयोः शुद्धिसाम्ये कैवल्यमिति॥५५॥

4.कैवल्यपाद – 34 सूत्र  

  1. जन्मौषधिमन्त्रतपःसमाधिजाःसिद्धयः॥१॥
  2. जात्यन्तरपरिणामः प्रकृत्यापूरात्॥२॥
  3. निमित्तमप्रयोजकं प्रकृतीनां वरणभेदस्तु ततः क्षेत्रिकवत्॥३॥
  4. निर्माणचित्तान्यस्मितामात्रात्॥४॥
  5. प्रवृत्तिभेदे प्रयोजकं चित्तमेकमनेकेषाम्॥५॥
  6. तत्र ध्यानजमनाशयम्॥६॥
  7. कर्माशुक्लाकृष्णं योगिनस्त्रिविधमितरेषाम्॥७॥
  8. ततस्तद्विपाकानुगुणानामेवाभिव्यक्तिर्वासनानाम्॥८॥
  9. जातिदेशकालव्यवहितानामप्यानन्तर्यं स्मृतिसंस्कारयोरेकरूपत्वात्॥९॥
  10. तासामनादित्वं चाशिषो नित्यत्वात्॥१०॥
  11. हेतुफलाश्रयालम्बनैः संगृहीतत्वादेषामभावे तदभावः॥११॥
  12. अतीतानागतं स्वरूपतोऽस्त्यध्वभेदाद्धर्माणाम्॥१२॥
  13. ते व्यक्तसूक्ष्मा गुणात्मानः॥१३॥
  14. परिणामैकत्वाद्व्स्तुतत्त्वम्॥१४॥
  15. वस्तुसाम्ये चित्तभेदात्तयोर्विभक्तः पन्थाः॥१५॥
  16. न चैकचित्ततन्त्रं वस्तु तदप्रमाणकं तदा किं स्यात्॥१६॥
  17. तदुपरागापेक्षत्वाच्चित्तस्य वस्तु ज्ञाताज्ञातम्॥१७॥
  18. सदा ज्ञाताश्चित्तवृत्तयस्तत्प्रभोः पुरुषस्यापरिणामित्वात्॥१८॥
  19. न तत्स्वाभासं दृश्यत्वात्॥१९॥
  20. एकसमये चोभयानवधारणम्॥२०॥
  21. चित्तान्तरदृश्ये बुद्धिबुद्धेरतिप्रसङ्गः स्मृतिसंकरश्च॥२१॥
  22. चितेरप्रतिसंक्रमायास्तदाकारापत्तौ स्वबुद्धिसंवेदनम्॥२२॥
  23. द्रष्टृदृश्योपरक्तं चित्तं सर्वार्थम्॥२३॥
  24. तदसंख्येयवासनाभिश्र्चित्रमपि परार्थं संहत्यकारित्वात्॥२४॥
  25. विशेषदर्शिन आत्मभावभावनाविनिवृत्तिः॥२५॥
  26. तदा विवेकनिम्नं कैवल्यप्राग्भारं चित्तम्॥२६॥
  27. तच्छिद्रेषु प्रत्ययान्तराणि संस्कारेभ्यः॥२७॥
  28. हानमेषां क्लेशवदुक्तम्॥२८॥
  29. प्रसंख्यानेऽप्यकुसीदस्य सर्वथा विवेकख्यातेर्धर्ममेघः समाधिः॥२९॥
  30. ततः क्लेशकर्मनिवृत्तिः॥३०॥
  31. तदा सर्वावरणमलापेतस्य ज्ञानस्यानन्त्याज्ज्ञेयमल्पम्॥३१॥
  32. ततः कृतार्थानां परिणामक्रमसमाप्तिर्गुणानाम्॥३२॥
  33. क्षणप्रतियोगी परिणामापरान्तनिग्रार्ह्यः क्रमः॥३३॥
  34. पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं स्वरूपप्रतिष्ठा वा चितिशक्तिरिति॥३४॥

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